Movie Review October -प्यार की एक अनकही दास्ताँ

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शूजित सरकार एक ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने हमेशा से ही लीग से हटकर फिल्में बनाने की कोशिश की है। ‘विक्की डोनर’, ‘मद्रास कैफे’ या फिर ‘पीकू’ जैसी फिल्मों में देखें तो स्पष्ट है कि उनकी फिल्मों में सहजता एक स्वाभाविक किरदार होती है। इस बार भी वह हमेशा की तरह कुछ नया लेकर आए हैं। शूजित की नई फिल्म ‘अक्टूबर’ एक अनुभव की तरह है जिसे आप महसूस करेंगे। इसको देखने के बाद आपका दिल हल्का लगेगा और ऐसा महसूस होगा कि जिंदगी के कुछ पन्ने मैंने अभी-अभी पढ़े हैं। फिल्म को जितनी शानदार तरीके से लिखा गया है उतनी ही शिद्दत से इसे फिल्माया भी गया है। स्क्रीन प्ले धांसू नजर आ रहा है। कम शब्दों में कहें तो अक्टूबर एक शानदार फिल्म है। दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में डैन यानी दानिश (वरुण धवन) एक ट्रेनी है। शिवली (बनिता संधू) और मंजीत (साहिल वडोलिया) जैसे मित्र भी उसके साथ हैं। डैन अपनी जिंदगी में किसी काम को सीरियसली नहीं लेता मगर उसका सपना है कि वह एक रेस्तरां खोलेगा। सुबह होटल आना, काम पर लग जाना, आकर खाना खाकर सो जाना, सामान्य सी जिंदगी है। एक दिन एक दुर्घटना में शिवली घायल हो जाती है और कोमा में चली जाती है, उसके बाद उनकी लाइफ में क्या बदलाव आते हैं? इसी सामान्य सी कहानी का असामान्य प्रस्तुतीकरण है ‘अक्टूबर’। फिल्म का ओपनिंग सीन काफी खूबसूरत है। फिल्म के ओपनिंग क्रेडिट हैरान कर देते हैं क्योंकि पहले बनिता संधू का नाम आता है, उसके बाद गीतांजलि राव का नाम और फिर उसके बाद फिल्म के मुख्य किरदार वरुण धवन का नाम स्क्रीन पर दिखाई देता है। आश्चर्य की बात है कि, ‘मनवा’ के अलावा अक्टूबर में कोई भी गाना नहीं है और इस गाने को भी फिल्म के अंत में क्रेडिट देने के लिए बजाया जाता है। अक्टूबर थीम फिल्म में दिखाई गई है जो कि फिल्म को ईमोशनल फील देती है। जूही चतुर्वेदी की कहानी काफी संजीदा प्लॉट पर बेस्ड है और काफी कलात्मक भी है। फिल्म प्रेम कहानी और रोमांस से रहित है, लेकिन कुछ पलों में यह दर्शाया जाता है कि यह एक प्रेम कहानी है। प्रेम का एक अलग आयाम देखने के लिए आप ‘अक्टूबर’ देख सकते हैं।

वरुण धवन बॉलीवुड में सबसे ज्यादा बिजनेस दिलाने वाले अभिनेताओं में से एक हैं माने जाते हैं। अपनी फिल्मों में जहां एक तरफ वरुण एक चॉकलेटी बॉय के रूप में इमेज बनाई है, वहीं इस फिल्म में उन्होंने कुछ अलग करने की कोशिश की है। फिल्म में दिखाए गए हॉस्पिटल के सीन्स में वरुण के इमोशनल एक्प्रेशन बिल्कुल परफेक्ट हैं। अगर हम बात करें बनिता संधू की तो इस फिल्म में एक पेशेंट का किरदार निभाने के कारण भले ही उन्हें ज्यादा अदाकारी दिखाने का मौका नहीं मिला हो लेकिन फर्स्ट हाफ में उनकी एक्टिंग एक अच्छा इंम्प्रेशन छोड़ती है।